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नफरत की राजनीति क्यों?

2018-03-09 |

निर्मलेंदु साहा, कार्यकारी संपादक, राष्ट्रीय उजाला- आपने कहा कि मैं हिंदू हूं, ईद नहीं मनाता, इसका मुझे गर्व है। यदि आप इतना ही कह देते कि आप हिंदू हैं, इसका आपको गर्व है, तो शायद अच्छा होता। आपने यह भी कहा कि मैं जनेऊ धारण कर, सिर पर टोपी पहनकर कहीं मत्था नहीं टेकता। ये बातें आपने किस संदर्भ में कहीं, यह सबको पता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि आप केवल इतना ही कहते कि आप हिंदू हैं और इसका आपको गर्व है, तो लोग बात का बतंगर नहीं बनाते। खुलकर बोलना और साफ साफ बोलना अच्छी बात है, लेकिन कहां कितना बोलना है, कहां कितना कम बोलना है, कहां चुप रहना है, कैसे बोलना है, किस रूप में बोलना है, कहां तक बोलना है, बोलते वक्त चेहरे का हाव भाव कैसा हो, इन बातों पर भी विचार करना होगा। आप उत्तर प्रदेश के सीएम हैं। सीम की गरिमा उनकी भाषा, उनकी बोलचाल और हाव-भाव में दिखनी चाहिए। आपने विपक्ष पर तो जोरदार रूप से हमला कर दिया, लेकिन आपके चाहनेवाले दुखी हुए। नहीं, आपने ऐसा नहीं चाहा होगा, लेकिन न चाहते हुए भी आपने इस तरह की ‘असंसदीय’ भाषा का प्रयोग कर दिया। आप समझदार सीएम हैं और आगे जाकर आपको कुछ और हासिल करना है, लेकिन यदि इस तरह की भाषा का आप प्रयोग करेंगे, तो दो संप्रदाय के बीच आप स्वयं भेदभाव पैदा कर देंगे। आप किसी चीज को पसंद नहीं करते, तो उसका जिक्र न करें, जिस चीज को पसंद करते हैं, उसके बारे में बताएं। जो न जानते हों, उन्हें उसकी खासियत से अवगत कराएं। अपनी बात रखें, लेकिन तोल मोल के। संसदीय गरिमा के साथ।

नफरत की सियासत क्यों? केवल सीएम बने रहने के लिए। ऐसा काम करके जाएं कि लोग आपके जाने के बाद भी यही कहें कि योगी की बात ही निराली है। योगी जी, आपको संयम से काम लेना होगा। आपके ऊपर उत्तरप्रदेश की जिम्मेदारी है। सबसे बड़ा राज्य है उत्तरप्रदेश। सत्ता के नशे में आप अपनी परंपरा और आचार, व्यवहार और अपनी साख न खो दें। आप तो मुझसे भी ज्यादा जानते हैं। परिस्थितियां कभी समस्या नहीं बनतीं, समस्या तभी बनती हैं, जब हमें परिस्थितियों से निपटना नहीं आता। सच तो यही है कि सभी समस्याएं मन की ही उपज हैं, सभी नकारात्मक विचार हमारे मन के अंदर से ही आती है। संसार बुरा नहीं है, हम बुरे हैं, क्योंकि हम ही उसे सुंदर या कुरूप बनाते हैं।हम अपने स्वार्थ के लिए सच को झूठ और झूठ को सच बना देते हैं। लेकिन सच हमेशा खड़ा रहता है, चाहे लोगों का समर्थन मिले या न मिले। दरअसल, सच ही आत्मा है। आप बेहतर जानते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा था कि कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा। यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रुकेगा, और न ही सत्ता के वृÞक्षों से रुकेगा। मधुर वचन और दूसरों के सम्मान से ही मनुष्य जीवन का पतन रुक सकता है। हम सब न केवल जानते हैं, बल्कि मानते भी हैं कि जो ज्ञानी है, उसे समझाया जा सकता है, जो अज्ञानी होता है, उसे भी समझाया जा सकता हैकिन जो अभिमानी, अहंकारी होता है, उसे कोई नहीं समझा सकता।

कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर कह गए हैं कि अज्ञान के समान कोई शत्रु नहीं है तथा ज्ञान के समान कोई सुख नहीं है। हमें एक बात हमेशा गांठ बांध लेनी चाहिए कि मूर्ख अपने घर में पूजा जाता है, मुखिया अपने गांव में, परंतु विद्वान सर्वत्र पूजा जाता है। आप या हम अगर विद्वान हैं, तो हम हमेशा याद किए जाएंगे। मांगनेवाले दो तरह के होते हैं। एक है प्रजा, जिसका जनम ही हुआ है मांगने के लिए और दूसरा है राजा, जो कि उच्चतम श्रेणी के मांगनेवाले होते हैं। वे भी मांगते हैं वोट। वोट मिलने के बाद फिर से वो राजा बन जाते हैं पाच साल के लिए। भूल जाते हैं कि पांच साल यूं ही बीत जाएगा। दरअसल, प्रेम और भक्ति का मार्ग बहुत ही आसान लगता है, लेकिन इस मार्ग पर ज्ञान मार्ग की अपेक्षा कहीं ज्यादा गड्ढे हैं, जिनमें गिरने का खतरा कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में बना ही रहता है।

(साभार श्री निर्मलेंदु साहा के फेसबुक वॉल से)


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