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लखनऊ मेयर चुनाव में किसने कहां की चूक?

2017-11-27 |

 राजीव शुक्ल, प्रधान संपादक- यूपी में दूसरे दौर का नगर निकाय और मेयरों का चुनाव   निपट  गया। ईवीएम मशीनों में गड़बड़ियां, मतदान में लोगों की दिलचस्पी कम होना आदि-   आदि वा कई चिंता की बात है। अब सबकी नज़रें पहली दिसंबर पर टिकी हैं, जब ईवीएम का   मुंह खुलेगा और पता चलेगा कि कौन कितने पानी में है। सबसे पहले बात करते हैं कि   लखनऊ  नगर निगम के लिए पहली बार चुनी जानेवाली महिला उम्मीदवारों के दमखम, रणनीति, जन संपर्क के तौर –तरीक़ों की। यानी लब्बो- लुआब ये है कि हम ये बताएंगे कि किसने कहां और कैसे चूक कर दी। इसका मतलब कतई ये ना निकाला जाए कि हम हार या जीत का फैसला सुनाने जा रहे हैं।

शुरूआत सत्ताधारी बीजेपी से। बीजेपी शुरु से ही बेहद सधे हुए और सुलझी हुई रणनीति के तहत चुनावी समर में उतरी। सतीश भाटिया की पत्नी संयुक्ता को मेयर उम्मीदवार घोषित करने के बाद बीजेपी ने बग़ावत की एक चिंगारी तक नहीं भड़कने दी। संयुक्ता को जिताने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्रियों दिनेश शर्मा, केशव प्रसाद मौर्या और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं। जनसंपर्क मज़बूत किया। क्योंकि ये चुनाव संयुक्ता से कहीं ज़्यादा दिनेश शर्मा और सीएम के लिए महत्वपूर्ण थी। दो दो बार मेयर रह चुके दिनेश शर्मा के रहते अगर वो हार जातीं, तो दिनेश शर्मा की फज़ीहत होती। वहीं सीएम के लिए सबसे बड़ी चुनौती रही कि अगर वो पूरा यूपी जीतने के बाद भी अगर गोरखपुर और लखनऊ नहीं संभाल पाते तो नाक कट जाती। प्लस प्वाइंट ये भी रहा कि लखनऊ बीजेपी का गढ़ माना जाता है। कार्यकर्ताओं और आरएसएस के लोगों ने बूथ लेवल तक मैनजमेंट संभाले रखा।अगर बात समाजवादी पार्टी की करें तो मीरा वर्द्धन के लिए पार्टी का सिंबल और अध्यक्ष अखिलेश यादव का साथ ही सहारा था। अखिलेश ने जिस तरह से इस बार सियासी मिज़ाज दिखाए हैं, उससे उनका खिसका हुआ जनाधार काफी हद तक वापिस मिलता दिख रहा है। दूसरी बात मीरा बिज़नेस वुमेन हैं। इसलिए अभी तक उनका जनता से वास्ता नहीं रहा। बुद्धिजीवी वर्ग के अलावा आम लोग उनके दादा ससुर आचार्य नरेंद्र देव का योगदान नहीं जानते। मीरा के लिए केवल अखिलेश ने ही रैली की। बाकी बड़े नेता चाहें वो मुलायम सिंह हों या फिर शिवपाल सिंह- सब सन्नाटे में बैठे रहे। पहली बार सियासत की पारी खेलने उतरीं मीरा ने जो कुछ भी हासिल करने की कोशिश की, वो उनके लिए अच्छा सियासी अनुभव होगा। 

कांग्रेस की प्रेमा अवस्थी के लिए अपने पति का नाम-दाम, कांग्रेस का निशान काफी हद तक मददगार रहा। उनके लिए बेशक़ बड़े नेताओं ने प्रचार किए। विरोधियों पर हमले किए। लेकिन उनके खिलाफ़ शुरु से ही कई बातें तैरती रहीं। एक तो प्रदेश में हाशिए पर चली गई कांग्रेस के पास वोट जुटाऊ उस तरह का नेता नहीं बचा है। मुस्लिम वोट से जो उम्मीद थी, उस पर अखिलेश ने डाका डाल दिया। दिवंगत पति पुत्तू अवस्थी का हर पार्टी का झंडा थामना और बीजेपी नेता दिनेश शर्मा का रिश्तेदार होना भी उनके खिलाफ गया। उससे भी बड़ी बात ये है कि वो प्रचार-प्रसार में शुरु से ही कमज़ोर दिखीं।

बीएसपी की बुलबुल गोदियाल ने अपने दम पर लड़ाई में आने की पुरज़ोर कोशिश की। बीएसपी का लखनऊ शहर में डेडिकेटेड वोटर कम है। पार्टी की हालत पतली है। खुद मायावती तक वोट डालने नहीं गई। बुलबुल के पक्ष में कुछ वकीलों का साथ आने उन्हे रेस में ले आया। इसके अलावा सोशल मीडिया का शानदार इस्तेमाल करते हुए बुलबुल ने खुद को लड़ाई के मैदान में बनाए रखा। जबकि आम आदमी पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था। उसे जो भी मिलेगा, वो हासिल में गिनती होगी। अरविंद केजरीवाल का क्रेज़ पहले जैसा नही रहा। वो खुद कभी राजनीति में नहीं रहीं। पति का कारोबार संभालती रहीं। पति गौरव पार्टी के ज़िला संयोजक हैं। प्रचार-प्रसार में कमज़ोर रहीं। सोशल मीडिया से जन्मी पार्टी की उम्मीदवार इस मोर्चे पर कमज़ोर रहा। इसलिए शुरू से ही उन्हें मतदाताओं ने हल्के में लिया।


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